छत्तीसगढ़ के कोरबा के कटघोरा में स्थित भारत माता मंदिर साल में सिर्फ दो बार खुलता है, जो देशभक्ति, एकता और सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है.
धर्म-जाति से परे... साल में सिर्फ दो बार होते दर्शन, देखते ही गर्व से कहेंगे- हम हिंदुस्तानी
कोरबा. छत्तीसगढ़ के कोरबा में एक ऐसा अनूठा मंदिर है, जिसके पट साल में सिर्फ दो बार खुलते हैं. यह मंदिर न सिर्फ देश के प्रति देशभक्ति का प्रतीक है, बल्कि सर्वधर्म समभाव और राष्ट्रीय एकता का अनुपम उदाहरण भी प्रस्तुत करता है. हम बात कर रहे हैं जिले के कटघोरा में स्थित भारत माता मंदिर की, जो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के पावन अवसरों पर ही अपने भक्तों और देशप्रेमियों के लिए खोला जाता है.
कटघोरा के इस ऐतिहासिक भारत माता मंदिर की नींव सन 1952 में रखी गई थी. इसकी अवधारणा तत्कालीन तहसीलदार आर.एस. ठाकुर ने स्थानीय शिक्षकों के सहयोग से की थी. शुरुआत में, यहाँ जमीन पर अखंड भारत का विशाल नक्शा उकेरा गया था, जिसकी श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की जाती थी. कालांतर में, इसी पवित्र स्थल पर एक छोटे मंदिर का निर्माण किया गया. वर्तमान में, संस्कार भारती के सदस्य पूरी निष्ठा के साथ इस मंदिर की देखभाल और पूजा-अर्चना का दायित्व निभाते हैं.
एकता दर्शाता है यह मंदिर
यह मंदिर केवल देश प्रेम और आजादी के संघर्षों की याद ही नहीं दिलाता, बल्कि देश की समृद्ध गंगा-जमुनी तहज़ीब का भी जीवंत प्रमाण है. कटघोरा के हिंदू, मुस्लिम सहित लगभग 22 समाजों के लोगों ने इस मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए एकजुटता दिखाई है. यह अभूतपूर्व एकता दर्शाती है कि देश प्रेम की भावना किसी धर्म, जाति या समुदाय की सीमाओं में बंधी नहीं होती. यह सर्वधर्म समभाव के विचार को पुष्ट करता है, जहाँ भारत माता की वंदना के लिए सभी एक साथ आते हैं.
लगभग सात दशक पुराना यह पवित्र स्थल लंबे समय तक उपेक्षित रहा है. हालांकि, हाल ही में इसके भव्य जीर्णोद्धार का कार्य शुरू किया गया है, जिससे मंदिर को उसका उचित वैभव मिलने की उम्मीद है. यह बात चिंतनीय है कि राष्ट्रीय पर्वों के अलावा यह मंदिर वीरान पड़ा रहता है, जहां देशप्रेम की लौ को निरंतर प्रज्वलित रखने की आवश्यकता महसूस होती है.
साल भर सक्रिय रखने की मांग
स्थानीय नागरिकों और संस्कार भारती के सदस्यों का मानना है कि इस मंदिर को सिर्फ दो दिन के बजाय साल भर सक्रिय रखा जाना चाहिए, ताकि यह पीढ़ियों तक देशभक्ति और सौहार्द का प्रेरणास्रोत बना रहे.इसके लिए प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को विशेष ध्यान देने की जरूरत है, ताकि यह अद्वितीय स्मारक केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर न रह जाए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता का जीवंत प्रतीक बना रहे.