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छत्तीसगढ़ के इस गांव में सात दिन पहले शुरू होती है होली, भगवान का आदेश तय करते हैं रंग खेलने की तारीख, जानिए क्या है पीछे की कहानी

 पूरे देश में होली का त्योहार 4 फरवरी को मनाया जाएगा, इसे लेकर अलग-अलग जगहों पर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. लोग बेसब्री से रंगो के इस त्योहार का इंतजार कर रहे हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में एक ऐसा गांव है, जहां कैलेंडर की तारीखें पीछे रह जाती हैं और आस्था सात दिन पहले ही उत्सव के रूप में शुरू हो जाती है. जहां एक तरफ पूरा देश होली के रंगों को खरीदने की तैयारी कर रहा होता है, तब इस गांव गलियां गुलाल और रंगों से रंगीन हो चुकी होती हैं. चलिए जानते हैं इस अनोखे गांव की कहानी.

सेमरा गांव अपनी अनोखी होली परंपरा के लिए एक खास पहचान रखता है. यहां होली का जश्न निर्धारित मुख्य तिथि से पूरे सात दिन पहले ही शुरू हो जाता है. जब पूरी दुनिया में होलिका दहन की तैयारी शुरू होती है, तब सेमरा के ग्रामीण रंग-गुलाल में डूबकर एक-दूसरे को बधाई दे चुके होते हैं. गांव में ढोल-नगाड़ों की गूंज और नाच-गाने के साथ फागुन का स्वागत हर जगह से पहले हो जाता है. 


इन अनोखी परंपरा के पीछे एक प्राचीन मान्यता छिपी है. गांव में बुजुर्गों का कहना है कि उनके आराध्य सियार देव ने पूर्वजों को सपने में दर्शन दिए थे. देव ने आदेश दिया था कि गांव को प्राकृतिक आपदाओं, महामारियों और किसी भी अनहोनी से बचाने के लिए होली, दिवाली, पोला और हरेली जैसे सभी बड़े त्यौहार निर्धारित समय से एक सप्ताह पूर्व मनाए जाएं. तभी से ग्रामीणों ने इस दैवीय आदेश को मान लिया. 

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ग्रामीणों का विश्वास है कि यह सिर्फ एक रीत नहीं, बल्कि गांव की सुरक्षा कवच है. बुजुर्ग बताते हैं कि अतीत में कुछ लोगों ने इस परंपरा को तोड़कर मुख्य तिथि पर त्यौहार मनाने की कोशिश की थी, लेकिन इसके परिणाम बहुत भयानक रहे. कहते हैं कि जब भी परंपरा से छेड़छाड़ हुई, गांव पर विपत्तियां आईं, कभी फसल बर्बाद हुई, कभी अकाल पड़ा तो कभी रहस्यमयी बीमारियां फैल गईं. 


सेमरा की होली का केंद्र गांव के बीचों-बीच स्थित सियार देव का मंदिर है. किसी भी उत्सव की शुरुआत यहीं से होती है. परंपरा के अनुसार, ग्रामीण सबसे पहले मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. भगवान को अबीर-गुलाल चढ़ाया जाता है और उसके बाद ही होलिका दहन की प्रक्रिया शुरू होती है. यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि गांव की एकता और पहचान का प्रतीक भी माना जाता है.


इस पूरे उत्सव का एक खूबसूरत पहलू यह है कि गांव की विवाहित बेटियां इस विशेष होली के लिए खास तौर पर अपने मायके आती हैं. बुधवार के दिन पूरा गांव फाग गीतों की धुन पर थिरकता है. ढोल-मंजीरा की थाप पर छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की गूंज और मुस्कराते चेहरों के बीच पूरा क्षेत्र उत्सव के रंग में डूब जाता है. इस गांव की गलियों में जमकर गुलाल उड़ता है.
 

हैरानी की बात यह है कि विज्ञान और तकनीक के इस दौर में भी सेमरा की नई पीढ़ी इस परंपरा पर गर्व करती है. युवाओं के लिए यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और जड़ों से जुड़ाव का जरिया है. आज के पढ़े-लिखे युवा भी सियार देव के आदेश का पूरी श्रद्धा से पालन करते हैं और इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि बदलते समय के साथ प्राचीन पहचान को जिंदा रखना भी जरूरी है. 


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