संगठन की सदस्यों ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से यह वितरण कार्यक्रम जशपुर के बाजार डांड स्थित रौनियार भवन के सामने किया जा रहा था। लेकिन इस वर्ष सभी ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि फिर से पुरानी परंपरा को जीवित किया जाए और किसी दूरस्थ व उपेक्षित गांव में जाकर सीधे लोगों से संवाद किया जाए। विकास के दावों के बीच यह बस्ती आज भी बूंद-बूंद के लिए तरस रही है।ग्रामीण एक छोटी सी ढोढी का दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। पानी का स्रोत इतनी गहराई और दुर्गम रास्ते पर है कि संगठन की केवल 3-4 महिलाएं ही वहां तक पहुंच पाने में सक्षम हो सकीं। यह स्थिति दर्शाती है कि गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को रोजाना पानी के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता होगा। रौनियार समाज की सीमा गुप्ता ने बताया कि यह बस्ती हमारी संवेदना का गोद ग्राम है। यहां के लोग अत्यधिक गरीबी और उपेक्षा में जी रहे हैं। गंदा पानी पीना इनकी मजबूरी है।हम इनकी समस्या अधिकारियों के पास रखकर समाधान करायेंगे।
जहां नए साल के आगमन पर लोग जश्न और पिकनिक में डूबे रहते हैं, वहीं जशपुर की रौनियार महिला शक्ति ने इस बार मानवता की सेवा की एक अनूठी मिसाल पेश की है। संगठन की महिलाओं ने किसी रिसॉर्ट या पिकनिक स्पॉट पर जाने के बजाय जिला मुख्यालय से सटे, किंतु सुविधाओं से कोसों दूर पहाड़ी कोरवा बस्ती(कोरवा पारा) में जाकर जरूरतमंदों के बीच खुशियां बांटीं। रौनियार महिला शक्ति की सदस्यों ने आपसी सहयोग से जुटाए गए सामान का वितरण किया। बच्चों के चेहरे तब खिल उठे जब उन्हें बिस्किट, चॉकलेट के साथ-साथ शिक्षा के लिए पेन, कॉपी, कलर और पेंसिल प्रदान की गई। वहीं, कड़ाके की ठंड को देखते हुए बुजुर्गों और ग्रामीणों को स्वेटर, वस्त्र और कंबल वितरित किए गए।