छत्तीसगढ़ का राजगीत ‘अरपा पैरी के धार’ राज्य की मिट्टी, नदियों, लोकसंस्कृति और प्रकृति प्रेम का सजीव प्रतीक है. डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा द्वारा रचित यह गीत मातृभूमि के प्रति समर्पण, गौरव और आत्मगौरव का स्वर है. इसकी हर पंक्ति छत्तीसगढ़ की सुंदरता, सादगी और लोकलय को दर्शाती है.
रायपुर : देश के हर राज्य की कोई न कोई विशिष्ट पहचान होती है, जो उसे विश्व पटल पर अलग स्थान दिलाती है. ठीक उसी तरह छत्तीसगढ़ राज्य भी अपनी समृद्ध संस्कृति, लोककला, परंपरा और सहज जीवनशैली के लिए जाना जाता है. यहां की मिट्टी में नृत्य, संगीत, लोकगीत और लोककथाओं की ऐसी सुगंध बसी है, जो इसे भारत के सबसे जीवंत राज्यों में से एक बनाती है. इसी सांस्कृतिक आत्मा को शब्दों में पिरोया गया है छत्तीसगढ़ के राजगीत ‘अरपा पैरी के धार’ में, जो राज्य के जन-जन की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है.
राजगीत ‘अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपार…’ छत्तीसगढ़ की नदियों, धरती, खेतों, पहाड़ों और यहां के लोगों के जीवन से उपजे उस प्रेम का प्रतीक है, जो इस भूमि को मातृभूमि का स्वरूप देता है. गीत के शब्दों में छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता, लोक-संस्कृति और आत्मगौरव झलकता है. गीत में अरपा, पैरी, इंद्रावती और महानदी जैसी नदियों का उल्लेख न केवल राज्य की भौगोलिक पहचान को दर्शाता है, बल्कि यह बताता है कि यहां का जीवन जल, जंगल और जमीन से कितनी गहराई से जुड़ा हुआ है.
सोहय बिंदिया सहीं, घाट डोंगरी पहार, चंदा सुरूज बनय तोर नैना… इन पंक्तियों में कवि ने छत्तीसगढ़ की धरती को एक जीवंत देवी के रूप में चित्रित किया है, जिसके नयन सूर्य और चंद्रमा हैं, और जिसके अंग सोने जैसे धान के खेत हैं. यह भावनात्मक चित्रण राज्य की मातृभक्ति और प्रकृति प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है.
इस गीत के रचयिता स्वर्गीय डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की माटी, बोली और संस्कृति को शब्दों में अनोखे ढंग से गढ़ा. 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस गीत को छत्तीसगढ़ का राजकीय गीत घोषित किया था. तब से यह गीत राज्य के हर समारोह, पर्व और सरकारी कार्यक्रमों में बजाया जाता है, जिससे लोगों में अपनी जड़ों के प्रति गर्व और अपनापन महसूस होता है.
राजगीत में ‘जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि यह 36 गढ़ों की भावना, लोकसंवेदना और मातृभूमि के प्रति समर्पण का स्वर है.यह गीत हर छत्तीसगढ़वासी को अपने प्रदेश की पहचान और गौरव की याद दिलाता है. यह गीत आज भी छत्तीसगढ़ की आत्मा की तरह सादगी में शान, मिट्टी में ममता और लोक में लय का प्रतीक बनकर गूंजता है.
छत्तीसगढ़ का राजगीत
अरपा पैरी के धार, महानदी हे अपारइंदरावती हा पखारय तोर पईयांमहूं पांवे परंव तोर भुंइयाजय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया
सोहय बिंदिया सहीं, घाट डोंगरी पहारचंदा सुरूज बनय तोर नैनासोनहा धाने के अंग, लुगरा हरियर हे रंगतोर बोली हावय सुग्घर मैनाअंचरा तोर डोलावय पुरवईयामहूं पांवे परंव तोर भुंइयाजय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया
रयगढ़ हावय सुग्घर, तोरे मउरे मुकुटसरगुजा अउ बिलासपुर हे बड़हांरयपुर कनिहा सही, घाते सुग्घर फबयदुरूग बस्तर सोहय पैजनियांनांदगांव नवा करधनियांमहूं पांवे परंव तोर भुंइयाजय हो जय हो छत्तीसगढ़ मईया