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रायगढ़ में डॉ. आलोक केडिया के क्लिनिक में अव्यवस्था चरम पर! सोनोग्राफी के लिए फीस ली, फिर भी नहीं मिला नंबर – मरीजों में उबाल

रायगढ़। जिले में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर आए दिन सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब यह मामला और गंभीर होता जा रहा है। रायगढ़ के चर्चित चिकित्सक डॉ. आलोक केडिया के क्लिनिक में रोज़ाना सैकड़ों मरीजों की भीड़ उमड़ती है, लेकिन उनमें से कई को भारी शुल्क देने के बावजूद समय पर जांच नहीं मिल पाती। खासकर सोनोग्राफी जांच को लेकर मरीजों का आक्रोश अब फूट पड़ा है।

सुबह 9 बजे से लाइन में लगने वाले मरीज 800 रुपये की फीस देकर जांच की उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन दोपहर तक कई मरीज बिना जांच कराए लौटने को मजबूर हो जाते हैं। बताया जा रहा है कि अगर कोई जल्दी जांच कराना चाहता है, तो अतिरिक्त 400 रुपये यानी कुल 1200 रुपये की मांग की जाती है, बावजूद इसके जांच समय पर नहीं होती। इस तरह के व्यवहार को लेकर मरीजों में भारी असंतोष देखा जा रहा है। मरीजो ने यह भी बताया कि यहां कार्य करने वाली महिलाएं कर्मचारियों की व्यवहार भी ठीक नही अपने नंबर के बारे पूछने जाने पर बैठे रहो सोनोग्राफी कराना है तो नही तो जाव ऐसे जवाब दिया जाता है आपका नंबर आएगा पर सुबह से शाम हो गया मरीज का नंबर नही आया।


पैसे पहले, नंबर बाद में – फिर भी नहीं मिला मौका!

क्लिनिक में रोज की स्थिति यह हो गई है कि बिना किसी पारदर्शी टोकन व्यवस्था के भीड़ को संभालने की कोशिश की जाती है, लेकिन सिस्टम की कमी के चलते अक्सर मरीजों को यह कहकर लौटा दिया जाता है कि “अब समय नहीं है, कल आइए।” मरीजों के मुताबिक, जांच की फीस पहले ले ली जाती है, लेकिन जांच न हो पाने की कोई जिम्मेदारी कोई नहीं लेता।

गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज़्यादा परेशान

सोनोग्राफी जैसी संवेदनशील जांच के लिए आने वाली गर्भवती महिलाएं, जो समय पर जांच ना होने पर जटिलताओं का शिकार हो सकती हैं, क्लिनिक में धक्के खाने को मजबूर हैं। एक महिला के पति ने बताया, “तीन दिन से लाइन में लग रहे हैं, लेकिन हर बार यही कहते हैं कि आज नहीं हो पाएगा। ये तो सरासर शोषण है।”

एक अन्य बुजुर्ग मरीज ने गुस्से में कहा, फीस के अलावा“400 रुपये देकर लाइन में लगो और फिर खाली हाथ लौटो? ये इलाज है या लूट?”

प्रशासन बना तमाशबीन, स्वास्थ्य विभाग मौन

चौंकाने वाली बात यह है कि इस अव्यवस्था और मनमानी के खिलाफ प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। ना स्वास्थ्य विभाग ने जांच बिठाई है और ना ही क्लिनिक संचालन पर कोई कार्यवाही की गई है। आम लोगों की मानें तो निजी चिकित्सकों पर नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो चुका है, जिससे वे मरीजों के साथ इस तरह का व्यवहार करने लगे हैं।


निगरानी तंत्र की मांग तेज

अब स्वास्थ्य जागरूक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि जिला प्रशासन तत्काल निजी क्लिनिकों और डायग्नोस्टिक सेंटरों पर नियंत्रण बनाए, उनके कार्यों की निगरानी करे और एक न्यायसंगत प्रक्रिया सुनिश्चित करे, जिससे मरीजों को समय पर इलाज मिल सके।

अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह लापरवाही भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकती है। मरीजों की पीड़ा को समझना और उस पर त्वरित एक्शन लेना अब प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी है।

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