ओडिशा, झारखंड जैसे पड़ोसी राज्यों के जंगल में मानवीय दखल के कारण वहां के हाथी नए ठिकाने तलाशते छत्तीसगढ़ की ओर रूख कर रहे है। राज्य में 10 साल पहले हाथियों की संख्या महज 150 थी, लेकिन अब इनकी संख्या ढाई गुना 359 हो चुकी है। इनमें सरगुजा रेंज में 125,
ओडिशा, झारखंड जैसे पड़ोसी राज्यों के जंगल में मानवीय दखल के कारण वहां के हाथी नए ठिकाने तलाशते हुए छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। यही वजह है कि 10 साल पहले जहां हाथियों की संख्या 150 थी, लेकिन अब ढाई गुना हो चुकी है। इन हाथियों ने प्रदेश में इस दौरान 3 नए कॉरिडोर भी बनाए हैं। करीब 1842.54 वर्ग किमी में फैले सीतानदी-उदंती टाइगर रिजर्व में 5 साल पहले तक हाथी नहीं थे, लेकिन अब चंदा हाथी के बाद सिकासार दल स्थाई बसेरा बनाकर कुनबा बढ़ा रहा है। बसने का कारण सालभर में ही 650 हेक्टेयर जंगल को अतिक्रमण मुक्त कर वन्य प्राणियों के लिए संरक्षित किया गया
उप निदेशक वरुण जैन की पहल पर एलीफैंट अलर्ट एप से हाथी-मानव संघर्ष रोकने में मददगार साबित हो रहा है। हथिनी चंदा ने अब तक 400 किमी का रिकॉर्ड कॉरिडोर बनाया है। ओडिशा से 2013 में 12 हाथी का झुंड महासमुंद जिले के बारनवापारा में पहुंचा था।
लगभग 5 साल बाद ये दल बाहर निकला और गरियाबंद होते 2020 में धमतरी जिले एवं बालोद-कांकेर जिले से होता हुआ 12 अगस्त 2022 को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में प्रवेश किया। यहां की सरकार ने करीब 2 साल में 11 करोड़ खर्च किए। भविष्य में हाथियों का कॉरिडोर महाराष्ट्र से छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश तक होने की संभावना है। यदि ऐसा हुआ, तो प्रदेश में हाथियों की संख्या तेजी से बढ़ेगी। वहीं प्रदेश के बस्तर एवं कांकेर वन वृत्त अभी हाथी मुक्त है।।
पड़ोसी राज्यों में मप्र की ओर प्रसार की संभावना
मध्यप्रदेश: 1920 के बाद करीब 100 साल बाद 2022 में हाथियों ने स्थाई ठिकाना बनाया है। इससे पहले हाथी मध्यप्रदेश की सीमा में घूमकर चले जाते थे। छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे इलाकों में 60 से ज्यादा हाथियों का मूवमेंट है, जो मध्यप्रदेश आते-जाते हैं।
महाराष्ट्र: 3 साल पहले 2021 में 300 साल बाद हाथियों ने दस्तक दी। 22 हाथियों का हथिनी चंदा धमतरी, बालोद, राजनांदगांव से होकर 2 साल पहले महाराष्ट्र के गढ़चिरौली पहुंचा। वडसा डिवीजन में रहने-खाने की सुविधा पाकर डेरा डाला है। इनकी संख्या अब 29 हो गई है।
