छाल/रायगढ़।
जिले के धर्मजयगढ़ विकासखंड अंतर्गत छाल क्षेत्र में संचालित हरिओम पब्लिक स्कूल एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गया है। तेजतर्रार और नियमप्रिय कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी द्वारा जिले के समस्त निजी स्कूलों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि किसी भी स्कूल में किसी भी प्रकार की पाठ्य सामग्री जैसे किताब, कॉपी, ड्रेस आदि की बिक्री नहीं की जाएगी। इसके साथ ही स्कूलों को निर्देशित किया गया था कि वे अपने स्कूल के नोटिस बोर्ड पर अध्ययन हेतु निर्धारित पुस्तकों की सूची चस्पा करें ताकि अभिभावकों को पारदर्शी तरीके से जानकारी मिल सके और वे बाजार से अपनी सहूलियत अनुसार किताबें खरीद सकें।
लेकिन इन आदेशों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए हरिओम पब्लिक स्कूल द्वारा न सिर्फ स्कूल परिसर में ही छात्रों को किताबें बेची जा रही हैं, बल्कि इन किताबों के दाम भी बाजार मूल्य से कहीं अधिक वसूले जा रहे हैं। इससे अभिभावकों की जेब पर सीधा असर पड़ा है और वे इस खुली लूट को लेकर आक्रोशित हैं।
कलेक्टर के आदेश बेअसर, स्कूल में हो रही खुली लूट
कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी द्वारा यह आदेश स्पष्ट रूप से जारी किया गया था कि किसी भी निजी स्कूल द्वारा किताबों, यूनिफॉर्म या स्टेशनरी की बिक्री स्कूल परिसर में नहीं की जाएगी और न ही किसी एक निर्धारित दुकान से खरीदारी के लिए अभिभावकों को बाध्य किया जाएगा। प्रशासन का उद्देश्य था कि शिक्षा के नाम पर व्यापार पर लगाम लगाई जाए और अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न डाला जाए। लेकिन हरिओम पब्लिक स्कूल ने इन आदेशों को कूड़ेदान में डालते हुए स्कूल को ही किताबों की दुकान में तब्दील कर दिया है।
बाजार मूल्य से अधिक दामों पर किताबों की बिक्री
अभिभावकों ने बताया कि स्कूल द्वारा जो किताबें दी जा रही हैं, वे बाजार में उपलब्ध किताबों की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत महंगी हैं। जब कुछ अभिभावकों ने बाहर से किताबें खरीदनी चाहीं, तो स्कूल प्रबंधन ने यह कहकर रोक दिया कि केवल स्कूल द्वारा दी गई किताबें ही मान्य होंगी, अन्य किताबों से पढ़ाई नहीं होगी। यह बात सीधे तौर पर प्रशासनिक आदेश की अवहेलना और उपभोक्ता अधिकारों का हनन है।
अभिभावकों की जेब पर भारी स्कूल का मनमाना रवैया
शिक्षा पहले ही एक महंगा क्षेत्र बन चुका है, ऊपर से इस तरह की मनमानी ने अभिभावकों की आर्थिक परेशानियों को और गहरा कर दिया है। खासकर ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च पहले ही एक चुनौती है। ऊपर से किताबों की जबरन बिक्री ने उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है।
स्कूल प्रबंधन पर कार्यवाही की मांग
स्थानीय अभिभावकों और जनप्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि हरिओम पब्लिक स्कूल के विरुद्ध तत्काल जांच कर कठोर कार्यवाही की जाए। कलेक्टर के आदेशों की इस तरह खुलेआम अवहेलना यदि बर्दाश्त की जाती है, तो अन्य स्कूलों को भी इसी तरह मनमानी करने का अवसर मिलेगा और प्रशासन की साख पर भी प्रश्नचिह्न लगेगा।
शिकायत के बाद भी प्रशासन मौन, उठ रहे सवाल
सबसे गंभीर बात यह है कि इस मुद्दे को लेकर कुछ अभिभावकों द्वारा ब्लॉक शिक्षा अधिकारी और स्थानीय प्रशासन से मौखिक शिकायत भी की गई थी, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि या तो प्रशासन की पकड़ कमजोर है या फिर शिकायतों को दबा दिया गया है।
शिक्षा का व्यापारीकरण बनता जा रहा आम चलन
छत्तीसगढ़ समेत देशभर में शिक्षा का व्यापारीकरण तेजी से बढ़ रहा है। निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों को अपने हिसाब से किताबें, ड्रेस और स्टेशनरी खरीदने के लिए बाध्य किया जा रहा है। यह प्रवृत्ति शिक्षा के मूल उद्देश्य के विपरीत है। यदि शिक्षा को मुनाफे की दुकान बना दिया गया, तो गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एक सपना बनकर रह जाएगी।
क्या कलेक्टर लेंगे सख्त एक्शन?
अब देखने वाली बात यह है कि जिले के तेजतर्रार और जनहितैषी कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी इस गंभीर मामले में क्या कार्यवाही करते हैं। जिस तरह से उन्होंने पूर्व में कई स्कूलों को नोटिस थमाया था और कई पर जुर्माना भी लगाया था, उसी तरह इस मामले में भी त्वरित कार्यवाही की अपेक्षा की जा रही है।
हरिओम पब्लिक स्कूल द्वारा कलेक्टर के स्पष्ट आदेशों को नजरअंदाज कर शिक्षा के नाम पर कारोबार किया जा रहा है। अभिभावकों की नाराज़गी अब सड़कों पर दिखने लगी है। यदि समय रहते प्रशासन ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह मामला आंदोलन का रूप भी ले सकता है। अब बारी प्रशासन की है कि वह नियमों की अवहेलना करने वालों पर नकेल कसे और शिक्षा को शुद्ध और सुलभ बनाए रखने की दिशा में मजबूत कदम उठाए।