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छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में कैसे पनपी-फैली क्रिश्चियनिटी:4 लोगों से 6 लाख पहुंची आबादी, जर्मन ने बनाया था पहला चर्च-कब्रिस्तान

छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण पर हिंदू और ईसाई समाज में टकराव के हालात हैं। 25 जुलाई को 2 मिशनरी सिस्टर्स की गिरफ्तारी हुई। इसकी सियासी आग राज्यसभा-लोकसभा तक जा पहुंची। ननों की गिरफ्तारी के खिलाफ दिल्ली से सांसदों का प्रतिनिधि मंडल दुर्ग जेल पहुंचा। सरकार पर ननों को झूठे केस में फंसाकर जेल में डालने का आरोप लगाया।

वहीं दूसरी ओर 28 जुलाई को कांकेर में ईसाई शख्स के शव दफनाने पर 500-1000 की भीड़ ने चर्च और घरों में तोड़फोड़ की। घरों में घुसकर सामान और बर्तनों को बाहर निकालकर फेंक दिया। बवाल के बीच कब्र से लाश निकालनी पड़ी। हालांकि मृतक के बड़े भाई ने मारकर गाड़ने का आरोप लगाया है।


अब इन सबके बीच हम आपको ईसाई धर्म की 157 साल पुरानी कहानी बताएंगे। कैसे एक जर्मन ने छत्तीसगढ़ में आकर ईसाई धर्म की स्थापना की, कैसे पहला चर्च बनाया, कैसे पूरे गांव को धर्मांतरित किया, कैसे 4 लोगों से आज 6 लाख की आबादी हो गई और कैसे उस जर्मन के बड़े बेटे को बाघ ने मार डाला ? विस्तार से पढ़िए इस रिपोर्ट में...

सबसे पहले आप छत्तीसगढ़ की आबादी के बारे में जानिए...

छत्तीसगढ़ में 2011 की जनगणना के मुताबिक 93.25% लोग हिंदू, 2.02% मुस्लिम, 1.92% ईसाई, 0.27% सिख, 0.27% बौद्ध और 1.94% लोग अन्य धर्मों के हैं, 0.09% लोगों ने कोई विशेष धर्म नहीं बताया। वहीं अगर संख्या की बात करें तो उस वक्त छत्तीसगढ़ की जनसंख्या 2,55,45,198 थी।
छत्तीसगढ़ में लगभग 900 चर्च
छत्तीसगढ़ में लगभग 727 चर्च हैं। हालांकि ग्रामीण अंचलों में छोटे-छोटे चर्चों को मिलाकर इनकी संख्या 900 के पार है। इनमें सबसे पहला चर्च विश्रामपुर में है, जो सिटी ऑफ रेस्ट के नाम से जाना जाता है, जिसे 1868 में बनाया गया था।

वहीं जशपुर के कुनकुरी में एशिया का दूसरा सबसे बड़ा रोमन कैथोलिक कैथेड्रल चर्च है, जिसे 1979 में स्थापित किया गया था। यहां प्रार्थना के लिए कई राज्यों से मसीह समाज के लोग आते हैं। साथ ही अलग-अलग समय धर्म प्रचार के लिए कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

अब पढ़िए छत्तीसगढ़ में 4 लोगों से कैसे पहुंची 6 लाख की आबादी ?

दरअसल, छत्तीसगढ़ के इतिहास में दर्ज है कि पहला मिशनरी चर्च (इम्मानुएल) 18वीं सदी में बलौदाबाजार के विश्रामपुर में बना था। इसे ‘द सिटी ऑफ रेस्ट’ के नाम से जाना जाता है। क्रिश्चियन समुदाय के लिए तो यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में फैले ईसाई धर्म की धारा यहीं से निकली है।

विश्रामपुर करीब 2 हजार लोगों की आबादी वाला गांव है, जहां लगभग हर घर ईसाई समाज के लोगों का है। 1868 में जर्मनी में जन्मे रेवरं फादर ऑस्कर टी लोर ने प्रदेश की पहली मिशनरी यहीं स्थापित की थी। यहां लोगों को लाकर बसाया। स्कूल, हॉस्टल, अस्पताल जैसे कई संस्थान बनाए गए।

फादर ऑफ विश्रामपुर ऑस्कर थियोडोर लोर

विश्रामपुर के काजल बताते हैं कि ये बहुत पुरानी बात है। हमारे बुजुर्गों ने बताया था कि 28 मार्च 1824 में जर्मनी में जन्मे ऑस्कर थियोडोर लोर के पिता सर्जन थे। उन्होंने अपने बेटे को मेडिकल की पढ़ाई के लिए पहले जर्मनी के एक कॉलेज में और फिर रशिया भेज दिया।

उन्होंने बर्लिन की गॉसनर मिशनरी सोसाइटी ज्वाइन की। वे पहली बार 1850 में रांची आए। 1857 तक उन्होंने यहां हिंदी सीखी, लोगों का इलाज किया, उनकी सेवा की। 1958 में वे अमेरिका चले गए। 1868 में फिर भारत लौटे।
इस बार वे परिवार सहित यहीं बस जाने के लिए आए थे। उन्होंने विश्रामपुर में अपनी सेंट्रल इंडिया की मिशनरी का हेडक्वार्टर बनाया और यहीं रहने लगे। उनकी पत्नी और दो बेटे भी उनके साथ यहां से ग्रामीणों के इलाज, उन्हें भोजन, शिक्षा, रोजगार मुहैया कराने में जुट गए।

गांव जहां 100 फीसदी आबादी क्रिश्चियन

विश्रामपुर में दोनों ओर के घरों में क्रॉस या ईसाई समाज के धर्म चिन्ह, स्लोगन लिखे दिखेंगे। फादर लोर यहां आए थे, तो इस इलाके में लोगों की मदद की। वे मेडिकल फील्ड से थे, लिहाजा दवाएं, इलाज, भोजन, शिक्षा और दूसरी सुविधाएं देकर लोगों को प्रभाव में ले लिया। 1870 से उन्होंने धीरे-धीरे लोगों को ईसाई धर्म में शामिल करना शुरू किया।

छत्तीसगढ़ का पहला चर्च और कब्रिस्तान

विश्रामपुर के संजय सिंह और काजल बताते हैं कि फादर लोर ने छत्तीसगढ़ के पहले चर्च की नींव रखी। 15 फरवरी 1873 को इम्मानुएल चर्च का निर्माण शुरू किया गया। 29 मार्च 1874 को यह बनकर तैयार हो गया।

पत्थरों से बने, बिना कॉलम के बने इस चर्च की सबसे बड़ी खासियत है इससे लगा हुआ कब्रिस्तान। यहां मुख्य प्रार्थना घर और कब्रों के बीच 10-12 फीट का रास्ता बस है। आज भी यहां शव दफनाए जाते हैं। जानकार बताते हैं कि देश में यह संभवतः पहला चर्च है, जिससे लगा हुआ कब्रिस्तान है।

फादर लोर ने ऐसा इसलिए किया कि एक ही परिसर में जीवन और मृत्यु लोगों को दिखते रहे। फादर लोर की मौत 1907 में कवर्धा में हुई, लेकिन उनका शरीर बाद में लाकर यहीं दफनाया गया। उनकी कब्र आज भी इसी कब्रिस्तान में है।

अब समझिए छत्तीसगढ़ में मिशनरी तेजी से क्यों फैला ?

फादर लोर और उनके दोनों बेटों ने प्रदेश के दूसरे हिस्सों में तेजी से अपनी मिशनरी मतलब ईसाई धर्म को फैलाना शुरू किया। जूलियस ने तो यहां के लोगों को ईसाई धर्म से जोड़ने के लिए बाइबिल के एक अध्याय गॉस्पेल ऑफ मार्क्स का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद कर दिया था।

फादर लोर की मिशनरी ने उस समय कितनी तेजी से छत्तीसगढ़ियों को ईसाई बनाया इसका उदाहरण है कि 1880 में जहां विश्रामपुर में 4 लोगों ने ईसाई धर्म अपनाया था, वहां 1883 आते-आते इनकी संख्या 258 पहुंच गई। 1884 तक विश्रामपुर के अलावा रायपुर, बैतलपुर और परसाभदर में मिशनरी के तीन सेंटर बना दिए गए थे।

इसके साथ ही इन जगहों में 11 स्कूल खोल दिए गए थे। अब तक इन सभी स्थानों पर दूसरे धर्मों से क्रिश्चियन बन चुके लोगों की संख्या 1 हजार 125 हो गई थी। 154 साल पहले विश्रामपुर से शुरू इस मिशनरी की शाखाएं गांव-गांव में हैं और लाखों लोग इससे जुड़े हैं।

बड़े बेटे को बाघ उठाकर ले गया

संजय सिंह बताते हैं कि डॉक्टर ऑस्कर टी लोर चर्च परिसर में ही बने बंगले में अपने परिवार सहित रहते थे। यह पूरा इलाका घना जंगल था। टाइगर जैसे कई खतरनाक जानवरों से भरा हुआ था। उनके दोनों बेटे कार्ल और जूलियस भी उनके साथ मिशनरी के सेवाकार्यों में शामिल थे।

एक कहानी है कि 25 अक्टूबर 1887 में कार्ल पर टाइगर ने अटैक कर दिया था। इस दौरान टाइगर के हमले से कार्ल की मौत हो गई थी। हालांकि गांव में एक चर्चा आज भी है कि कार्ल को बाघ उठाकर ले गया था, फिर वो ना मिला ना उसकी लाश मिली। इसके कुछ समय बाद ही उनके छोटे बेटे जूलियस की भी डिप्रेशन से मौत हो गई थी।

विकास की किरणें नहीं पहुंच पाई, उन जगहों को ईसाई समाज ने भरने का काम किया

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल बताते हैं कि जहां-जहां विकास की किरणें नहीं पहुंच पाई, जहां बुनियादी सुविधाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य नहीं पहुंच पाया। उन जगहों को, उन वैक्यूम को ईसाई समाज ने भरने का काम किया है। जब धार्मिक श्रेष्ठता का बोझ आपके मन में सवार हो, तो आप दूसरे धर्म को नीचा देखते हैं।

आलोक पुतुल बताते हैं किसी धर्म को कम आंकने में अक्सर टकराव की स्थिति बनती ही है, लेकिन बस्तर जैसे इलाकों में सांस्कृतिक कारण जो है, वो बड़ा है। आदिवासी बिल्कुल नहीं चाहते की, उनके जो तौर-तरीके हैं, उसमें हस्ताक्षेप हो। हिंदू संगठन उनके साथ खड़े हैं। ऐसे में ईसाई समाज और हिंदू समाज के बीच टकराव की स्थिति बन रही है।

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