पौराणिक मान्यता के अनुसार, छेरछेरा के दिन किसान अपनी फसल को भंडार गृह में संग्रहित कर खेती-किसानी से निवृत्त हो जाते हैं. यह पर्व प्रदेश की खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है. इस दिन ग्रामीण इलाकों में बच्चे और युवा घर-घर जाकर धान मांगते हैं.
बिलासपुर:- छत्तीसगढ़ अपनी अनोखी संस्कृति और परंपराओं के लिए देशभर में अलग पहचान रखता है. यहां के त्योहार न केवल समाज को एकजुट करते हैं, बल्कि इनका गहरा पौराणिक और सांस्कृतिक महत्व भी है. इन्हीं त्योहारों में से एक है छेरछेरा पर्व, जो प्रदेश में साल का अंतिम त्योहार माना जाता है. इस पर्व के साथ किसानों की मेहनत और फसल की खुशहाली का जश्न मनाया जाता है.
छेरछेरा पर्व की पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार, छेरछेरा के दिन किसान अपनी फसल को भंडार गृह में संग्रहित कर खेती-किसानी से निवृत्त हो जाते हैं. यह पर्व प्रदेश की खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है. इस दिन ग्रामीण इलाकों में बच्चे और युवा घर-घर जाकर धान मांगते हैं और “छेरछेरा माई कोठी के धान ल हेरहेरा” का नारा लगाते हैं. इस परंपरा का उद्देश्य समाज में एकता और सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करना है.
