मनीष पटेल, रायगढ़
गणेशोत्सव का अवसर है, लेकिन कोई न्यूज़ चैनल वाला ये बताने की जहमत नहीं उठाता, सन 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने आजादी के आंदोलन के दौरान सामाजिक समरसता बढ़ाने के लिए सार्वजानिक गणेशोत्सव की शुरुवात की थी, गणेश पंडालों में आज़ादी के आंदोलन से लोगो को परिचित करा कर अधिक से अधिक संख्या में उनकी सहभागिता सुनिश्चित की जाती थी,
भले ही आज तिलक हमारे बीच नही हैं लेकिन उनके बाद भी आज गणेशोत्सव का स्वरुप वैसा ही है, और लगभग पूरे भारतवर्ष में धूम धाम से मनाया जाता है।
बात उस दौर की है,
जब खुद के थोड़े थोड़े पैसे जोड़कर, मुहल्ले में चंदा लेकर गणेश जी स्थापना करना बड़ा शानदार आयोजन होता था,
हम मिडल क्लास लोग होते ही बड़े जुगाड़ू हैं,
लकड़ी के चार पांच तखत को जोड़ जोड़ कर स्टेज बनाना, उस स्टेज को मस्त साफ सी दरी से कवर करना,
फिर उस स्टेज के चारो तरफ बांस खड़े कर स्टेज को कनात से कवर करवाना, थर्मोकोल की शीट्स को रंग बिरंगा करके, तरह तरह के डिजाइन में काटना, चमकीली लड़ियों से, और मूर्ति पे एक मस्त सी कलर चेंजिंग फोकस लाइट सेट करके खुद से ही अपने पंडाल को डेकोरेट करना, इन दिनों का व्यस्ततम काम होता था,
फिर किसी के घर के दो बड़े साउंड बॉक्स लगाकर सुबह शाम अनुराधा पौडवाल जी आवाज में श्री गणेश अमृतवाणी के कैसेट बजाना और दिन में कई बार देवा हो देवा गणपति देवा तुम से बढ़कर कौन बजाना कम्पलसरी सा था!!
गलत ही थे वो लोग जो कहते थे भारत सांप सपेरों का देश है,
भारत पर्व त्यौहारों, और उत्साह उमंगों वाला देश है!!
हमारे इन पर्वो पे पूरी दुनिया की नजर रहती है,
चाहे वो कुंभ का मेला हो या नवरात्रि, सावन की कावड़ यात्रा हो या गणपति,
हमारे ये पर्व पूरी दुनिया पे अपनी छाप छोड़ते हैं,
बस इतना निवेदन है कि इन पर्वो की गरिमा बनाये रखे!!
और थोड़ा धैर्य बनाये रखें,
क्या आम दिनों में ट्रैफिक जाम नहीं होता, शोरगुल नहीं होता??
थोड़ा ट्रैफिक जाम या लाउड स्पीकर के शोर से भौंहे मत चढ़ाइये,
अगर आध्यात्मिक पहलू समझ न पाए तो आर्थिक पहलू से ही सोचियेगा,
ये ग्यारह दिन के बप्पा कई छोटे छोटे व्यापारियों के घर चलाने का इंतज़ाम कर जाते है,
सभी के घर मे बप्पा का रिद्धि सिद्धि के साथ आगमन हो,
इन्ही शुभकामनाओं सहित,
गणेशोसत्व की बधाईयां.....
