छत्तीसगढ़ के बेमेतरा में इंसान और मगरमच्छ की अनूठी दोस्ती की मिसाल पेश करने वाले 'गंगाराम' की कहानी अब NCERT के पाठ्यक्रम में शामिल की गई है. बावा मोहतरा गांव के तालाब में ग्रामीणों के साथ तीन दशकों तक शांति से रहने वाले इस शांत मगरमच्छ की कहानी बच्चों को सह-अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ाएगी.
गंगाराम के साथ ग्रामीणों का अटूट रिश्ता
दरअसल बेमेतरा जिले का छोटा सा गांव बावा मोहतरा दशकों से इस अद्भुत रिश्ते का गवाह रहा है. गांव के मुख्य तालाब में रहने वाला गंगाराम कोई साधारण मगरमच्छ नहीं था, बल्कि वह पूरे गांव का एक सम्मानित सदस्य बन चुका था. गांव के लोग रोजाना उसी तालाब में नहाते थे, पीने का पानी भरते थे, कपड़े और ट्रैक्टर धोते थे तथा अपने मवेशियों को पानी पिलाने लाते थे. बच्चे घंटों गंगाराम के आसपास तालाब में तैरते रहते थे, लेकिन गंगाराम ने कभी किसी ग्रामीण या बेज़ुबान जानवर को नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की. ग्रामीणों का गंगाराम पर और गंगाराम का इंसानों पर ऐसा अटूट विश्वास था कि लोग उसे अपने हाथों से खाना भी खिलाया करते थे.
आखिर क्यों हमला नहीं करता था गंगाराम?
सामान्यतः मगरमच्छों को बेहद हिंसक और आक्रामक माना जाता है, जो अपने इलाके में किसी भी हलचल को शिकार समझकर हमला कर देते हैं. लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों और जीवविज्ञानियों के अनुसार, गंगाराम के इस अनोखे और शांत व्यवहार के पीछे अनुकूलन और भोजन की नियमित उपलब्धता सबसे बड़ा कारण थी. जब कोई जंगली जानवर बचपन से ही इंसानों की लगातार मौजूदगी देखता है और उसे कभी किसी तरह का खतरा या असुरक्षा महसूस नहीं होती, तो उसकी प्राकृतिक आक्रामकता का स्तर धीरे-धीरे कम हो जाता है. ग्रामीणों द्वारा उसे लगातार समय पर भोजन मिलना और कभी भी उस पर हमला न करना या उसे न छेड़ना गंगाराम के व्यवहार में एक स्थायी सुरक्षा भाव ले आया. इसी आपसी सम्मान और लगातार शांतिपूर्ण माहौल ने गंगाराम को आक्रामक शिकारी से एक शांत जीव बना दिया था.
गंगाराम की मौत पर शोक में डूबा था पूरा गांव, बना मंदिर
जनवरी 2019 में जब लगभग 130 वर्ष की अनुमानित उम्र (कई रिपोर्टों के अनुसार लगभग 100 वर्ष से अधिक) में गंगाराम की प्राकृतिक मौत हुई, तो बावा मोहतरा गांव में मातम छा गया था. उस दिन गांव के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जला था और 500 से अधिक ग्रामीणों ने रोते हुए उसकी शवयात्रा निकाली थी. पूरे रीति-रिवाज और धार्मिक सम्मान के साथ गंगाराम का अंतिम संस्कार किया गया था. ग्रामीणों ने उसकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए तालाब के किनारे ही गंगाराम का एक मंदिर बनवाया, जहाँ उसकी प्रतिमा स्थापित की गई है. आज भी गांव वाले रोजाना उस मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं और बाहर से आने वाले पर्यटकों को गंगाराम की गाथा गर्व से सुनाते हैं.
स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल क्यों किया?
स्कूली किताबों में गंगाराम की कहानी को शामिल करने का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी में वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और सह-अस्तित्व (Co-existence) की भावना को जगाना है. अक्सर वन्यजीवों और इंसानों के बीच संघर्ष की खबरें ही सामने आती हैं, लेकिन बावा मोहतरा का यह उदाहरण सिखाता है कि अगर हम प्रकृति और जीवों के आवास का सम्मान करें, तो बिना हिंसा के भी साथ रहा जा सकता है. इसके साथ ही वन विभाग और विशेषज्ञ यह सावधानी भी बरतने की सलाह देते हैं कि गंगाराम का मामला एक अत्यंत दुर्लभ और अपवाद स्वरूप उदाहरण है, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में जंगली जानवरों से सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही बुद्धिमानी है.