Khabar Chhattisgarh

छत्तीसगढ़: जहां कभी बोलती थीं बंदूकें, वहां बाइक पर पहुंची बस्तर की 'अफसर बिटिया'

ये वही अबूझमाड़ है, जिसे लंबे समय तक देश का सबसे दुर्गम और अप्रवेश्य क्षेत्र माना जाता रहा। कदेर, काकुर और ओरछापाल जैसे गांव कभी माओवादियों के गढ़ रहे, जहां 'जनताना सरकार' के नाम पर समानांतर सत्ता चलती थी। फैसले बंदूक की नली से तय होते थे।

जगदलपुर। अबूझ पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक जगह आकर सड़क अचानक खत्म हो जाती है। आगे सिर्फ पगडंडी बचती है। न कोई निशान, न नेटवर्क, सिर्फ उफनते नाले, खड़ी चढ़ाइयां और जंगल का सन्नाटा।

इसी खामोशी को चीरती मोटरसाइकिलें आगे बढ़ती हैं, जिनमें से एक पर सुरक्षाबल के जवान के पीछे बैठी हैं नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन और साथ ही सीईओ आकांक्षा खलखो। यह कोई सामान्य दौरा नहीं, बल्कि उस इलाके में प्रशासन की वापसी है, जहां दशकों तक बंदूक का कानून था।

जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर यह सफर पक्की सड़क से शुरू होकर कच्चे रास्तों पर सिमटता है और गारपा के बाद पूरी तरह पगडंडियों में बदल जाता है। इसके बाद करीब 50 किलोमीटर तक पत्थरों, ढलानों और जोखिम भरे मोड़ों के बीच आगे बढ़ना पड़ता है।

ये वही अबूझमाड़ है, जिसे लंबे समय तक देश का सबसे दुर्गम और अप्रवेश्य क्षेत्र माना जाता रहा। कदेर, काकुर और ओरछापाल जैसे गांव कभी माओवादियों के गढ़ रहे, जहां 'जनताना सरकार' के नाम पर समानांतर सत्ता चलती थी। फैसले बंदूक की नली से तय होते थे।

माओवादी हिंसक जैसे गणपति, बसव राजू, भूपति, देवजी, गुडसा उसेंडी, कोसा और रुपेश, इन्हीं जंगलों से अपनी रणनीतियां संचालित करते थे। यहां उनके अपने स्कूल भी चलते थे, जहां अक्षर ज्ञान के साथ हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी जाती थी।

जहां 'जनताना राज' था, वहां भरोसे की आहट

बस्तर के जंगलों में अब तस्वीर बदल रही है। ओरछापाल में प्रधानमंत्री आवासों के निरीक्षण के दौरान कलेक्टर नम्रता जैन ने स्पष्ट कहा कि काम समय पर पूरा होना चाहिए।

कभी 'जनताना पट्टे' बांटने वाली जमीन पर अब प्रशासन का शिविर लगा, जहां करीब 100 ग्रामीण पहुंचे और 60 लोगों के आधार कार्ड बनाकर पहली बार उनकी पहचान सरकारी रिकार्ड में दर्ज की गई।

ग्रामीणों ने स्कूल, आंगनबाड़ी और गांव में ही राशन उपलब्ध कराने की मांग रखी, क्योंकि अब तक उन्हें 60 किलोमीटर दूर सोनपुर तक जाना पड़ता था।

कलेक्टर ने मौके पर ही कुछ बच्चों का आश्रम स्कूल में दाखिला, एक घर में आंगनबाड़ी शुरू करने और गांव तक राशन पहुंचाने की व्यवस्था के निर्देश दिए। हैंडपंप से गंदा पानी आने की शिकायत पर अगले ही दिन टीम पहुंची और समस्या दूर कर दी गई।

अबूझमाड़ में बदलाव की नई कहानी

करीब 4,000 वर्ग किलोमीटर में फैले अबूझमाड़ के इस क्षेत्र में 200 से अधिक गांव हैं, जिनमें कई अब भी पूरी तरह सर्वे में दर्ज नहीं हैं। माड़िया गोंड जनजाति का जीवन लंबे समय तक जंगल और परंपराओं के बीच सीमित रहा, जहां प्रशासन की पहुंच लगभग न के बराबर थी।

यही अलगाव माओवाद के लिए मजबूत आधार बना। हाल के वर्षों में सुरक्षा अभियानों और आत्मसमर्पण की घटनाओं ने माओवादी ढांचे को कमजोर किया है।

यहां सक्रिय माओवादी हिंसकों जैसे बसव राजू, गुड्सा उसेंडी, कोसा, सुधाकर सहित 100 से अधिक माओवादी मारे गए। भूपति, देवजी, रुपेश जैसे 200 से अधिक माओवादी समर्पण कर चुके हैं।



Post a Comment

Previous Post Next Post
 Khabar Chhattisgarh
 Khabar Chhattisgarh
 Khabar Chhattisgarh